( विध्यार्थी अपने आप ही अपने भविष्या का निर्माण करे )
विध्यार्थी जीवन , जीवन का सुवर्णकाल है Student Life Is The Golden Period Of Life. कुच्छ सीखने को , कुच्छ बनने का निरंतर प्रयास इस समय मे ही होता है एक विध्यार्थी के क्या लक्षण होते है , यह नीचे के श्लोक मे दिए गये है ------
" काकचेष्टा बकध्यानम श्वाननिंद्रा तथैव च ।
अल्पाहारी गृहत्यागी विध्यार्थी पन्चलक्षम ॥ "
[1] काक (कौआ) चेष्टा :- कौआ दूर आशमान मे स्वच्छंदता से उड़ाता रहता हो फिर भी उसकी तीव्र द्रष्टि द्वारा ज़मीन पर पड़ी हुई कोई खाध्यपदार्थ को देख कर चपलतापूर्वक वहाँ पहुँच जाता है तथा अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेता है। एसे ही विध्यार्थी भी ज्ञान की प्राप्ति के लिए तीव्र जिज्ञासा रखे तथा अपना लक्ष्य को प्राप्त करता जाय ।
[2] बकध्यानम :- बगुला (Heron) तालाब या नदी किनारे एक पैर (Leg) पर खड़ा रहकर ध्यान मग्न रहता है। मछली देखते तुरंत ही उसे झपट कर अपना आहार बनता है , फिर दुबारा ध्यानस्थ मुद्रा मे हो जाता है। विध्यार्थी भी विद्या अध्ययन में लगे रहे तथा ज्ञान-विज्ञान की बातों को ग्रहण करता हुआ निरंतर प्रगति पथ पर बढ़ता रहे।
[3] श्वान निंद्रा :- जिस तरह सोते हुए कुत्ते के पास से धीरे से भी पसार (धीरे से निकलना) होते हो फिर भी वह जाग (उठ जाना) जाता है , इस तरहा विध्यार्थी भी अपना जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सदाय (हमेशा) सावधान और जागरूक (Alert) रहे। एसी निन्द ' सात्विक ' है।
[4] अल्पाहारी :- विध्यार्थी जीवन ' साधना ' और ' तापश्चर्या ' का जीवन है। एक अध्ययनशील विध्यार्थी सदाय सादा सात्विक और अल्पभोजन लेनेवाला होता है। तामसिक , राजसिक और ज़्यादा आहार लेनेवाले विध्यार्थी की जीवन-शक्ति का ज़्यादातर भाग भोजन पचाने मे , नींद , आलस और तन-मन की बीमारियों का सामना करने मे खर्च हो जाता है। विध्यार्थी जीवन की सफलता के लिए स्वास्थ्य के प्राकृतिकनियमो का पालन अति आवश्यक है।
[5] गृहत्यागी :- एक आदर्श विध्यार्थी विध्या प्राप्ति के लिए गृहत्याग मे ही संतोष मानता है। विध्या प्राप्त करना ये एक तप करने जैसा है , नहि के मोज-मस्ती करने जैसा। सुख का त्याग आवश्यक है।
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GOD BLESS YOU

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