" राम "
- Kaushalya
एक जीने की सच्ची राह दिखता है,_
दूजा जीवन का उद्देश्य बताता है,_
वन में अहल्या का श्राप मुक्तकर,_
अपनी करुणा दिखाई ।_
पिता वचन की लाज रखकर,_
रघुकुल रीति निभाई।_
सीता का वरण करके,_
प्रीत की रित निभाई।_
भरत को राजगद्दी सोंपकर,_
भातृ के प्रति स्नेह बताया।_
चौदा वर्ष बनवास भोगकर,_
प्रभु ने त्याग की रीत शिखायी।_
मंथरा के अपराध को क्षमा कर,_
करूणानिधि ने क्षमा दान शिखलाया।_
गुहु को नदिया पार का मूल्य चुकाकर,_
शिष्टाचार से व्यवहार धर्म निभाया।_
शबरी के जुठे बेर खाकर,_
सच्ची चाहत को अमरता दिलवाई।_
सुग्रीव की प्राण रक्षाकर,_
रक्षण क्षत्रिय धर्म बताया।_
बजरंगबली के हृदय में रहकर,_
भक्ति की महिमा बढ़ायी।_
लंकेश्वर रावण का नाश कर,_
धर्म की रक्षा करना शीखाया।_
राज के धोबी के प्रश्न पर,_
प्रजा वत्सल ने न्याय की झाँकि दिखाई।_
सदगुणी रामजी को पाकर,_
समग्र धरती पावन हो गयी।_
मर्यादा पुरषोत्तम राम ने अपने द्रष्टांत से,_
हमे शिष्टाचार ग्यान देकर,_
सत्य का मार्ग दिखाया।_
" जय श्री राम जी "
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