गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

प्रेम सुधा

प्रेम सुधा
- Kaushalya
प्रेम क्या है, कुछ भी तो नहीं
सिर्फ एक मीठा एहसास है वो
प्रेम तो अपने आप में पूर्ण है
उसे देखना-समझना मुश्किल है
उसकी पहचान परखने से नहीं होती
प्रेम तो अनुभव करने का नाम है
श्री कृष्ण ने भी अपने जीवन से
प्रेम को जगत का सार कहा है
निर्मल-निश्छल-निस्वार्थ-निरामय
अलंकार है प्रेम रूपी रत्नाकर के
प्रेम से भक्ति के द्वार खुल जाते है
और भक्ति से परमेश्वर की पहचान
परमेश्वर में लीन हो कर जीवात्मा
सुख - दुःख से परे हो जाता है
वह कर्म के बन्धनों से मुक्त हो जाता है
जीवन के अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति होती है.
* * *

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