रविवार, 13 सितंबर 2020

प्राचीन भारतीय आर्य भाषा की विशेषताएं

प्राचीन भारतीय आर्य भाषा की विशेषताएं : 

*      प्राचीन आर्य भाषा में 13 स्वर ध्वनियाँ थी। 

जिसमे 9 स्वर थे – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, लृ 

*      चार संध्य स्वर थे – ए, ऐ, ओ, औ 

*      ‘ऐ’ और ‘औ’ का उच्चारण क्रमशः ‘आई’ एवं ‘आउ’ होता था। 

*      व्यंजनों के पांच वर्ग बन चुके थे – 

1)    क वर्ग 

2)    च वर्ग 

3)    ट वर्ग 

4)    त वर्ग 

5)    प वर्ग 

*      इसके अतिरिक्त चार अर्ध स्वर – [ य, र, ल, व ] 

एवं तीन उष्म – श, ष, स तथा एक महाप्राण ‘ह’ ध्वनियाँ थी। 

*      एक अनुनासिक (ं) एवं एक विसर्ग (ः) भी था। शब्दों के रूप, लिंग (तीन), वचन (तीन) एवं कारक (आठ) के आधार पर बनते थे। 

*      विशेषण संज्ञा के समान ही परिवर्तित होते थे। सर्वनामों के रूप में यथेष्ट विविधता थी। शब्द निर्माण में प्रत्ययो का प्रयोग होता था। 

*      शब्दों की सामासिक रचना का विधान था। समास रचना की प्रवृति मूल भारोपीय एवं भारत – ईरानी में थी। वहीं से यह परंपरा वैदिक संस्कृत में आई। वैदिक पद प्रायः दो शब्दों के ही मिलते है। इससे अधिक शब्दों के समास अत्यंत विरल है। 

*      शब्द : वैदिक भाषा में अनेक तद्भव या मूल शब्द से विकसित शब्द प्रयुक्त होने लगे थे। वेड में ‘ई’ [यहाँ] इसी प्रकार का है। इसका मूल शब्द-मूल ‘इध’ है। पाली ‘इधौं’ और अवेस्ता ‘इद’ इसी बात के प्रमाण है कि महाप्राण व्यंजन के स्थान पर ‘ह’ के विकास के कारण ‘इद’ से ‘इ’ बना। शब्दों की द्रष्टि से दूसरी विशेषता यह है कि उस काल में ही भाषा में अनेक आर्योत्तर शब्दों का आगमन होने लगा था। 

जैसेः वैदिक भाषा में – ‘अगु’, ‘कपि’, ‘गण’, ‘अरणि’, ‘काल’, ‘नाना’ (प्रकार), ‘पुष्कर’, ‘पुष्प’, ‘मयूर’, ‘तंडुल’, ‘मर्कट’ आदि द्रविड़ भाषा आदि से आए है। 

‘वार’, ‘कंबल’, ‘बाण’ आदि ऑस्ट्रिक भषा से आए है।       

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