गुरुवार, 4 जनवरी 2018

कविता नहीं है ये


कविता नहीं ये मेरे दिल का है दर्द ,
प्रत्याघात मिले उसका है प्रतिबिम्ब,
कविता नहीं है ये

गूंज है मेरी उन अनुभूतियों की,
मन में व्याप्त उस घुटन की आह है,
कविता नहीं है ये

सपना जो टूटा था उसकी आवाज़ है,
मैंने जो महसूस किया था उसके सूर है,
कविता नहीं है ये

अपना जिसे माना था वहीं थी चुभन,
पराया समझ कर दिए थे जख्म गहरे,
कविता नहीं है ये

दिल दुखाया था दिल्लगी करके,
बिखेर दिया था मेरी हसरतों को,
कविता नहीं है ये

आवाज़ नहीं सुनाई दी मेरे दर्द की,
क्योंकि मन कांच के टुकड़े से नहीं बना,
कविता नहीं है ये

बन बैठा था जो इन्सान से जानवर,
खो कर प्रेम और नफ़रत के अंतर को,
कविता नहीं है ये

क्षणभर क्रोध ने उजड़ा मन का चमन,
दिल पर मंडराएं अविश्वास के बादल,
कविता नहीं है ये

एक भरोसे का खंडन हुआ था,
विराने में अकेला छोड़ दिया था जैसे,
कविता नहीं है ये

महसूस हुआ कोई नहीं है जग में तेरा,
अकेले आये थे और अकेले ही जायेंगे,
विश्वास कर दिया कायम


मंगलवार, 2 जनवरी 2018

रहे पास के दूर


नजदीकियों से तो दूरियाँ भली,

पास रहकर प्रित महसूस नहीं होती,
दूर रहकर प्रेम नव पल्लवित होता।

पास रहकर भी दूरियाँ सी लगती,
दूर से भी नजदीकियों की अनुभूति।

पास से फैले नफ़रत की ज्वाला,
दूर से उर में अमिरस धारा।

पास होते तो फरियाद सी रहती,
दूर होने से विरह की तड़पन।

पास होते तो दूर जाने को कहते,
दूर होते तब पास रहने की झंखना।

पास होते तो पाषाण ह्रदय,
दूर से कोमलपुष्प ह्रदय।

एक क्षण को प्रेम उमड़ता,
दूसरे ही क्षण स्वार्थ छलकता ।

सखी,
समझ नहीं आता क्या कहे इसे,
पारदर्शी है या छल है कोई।

मुखौटा है या सच्चाई,
अंतर करना है मुश्किल।

मन यह दोहरे बर्ताव से असंजस में है,
नजदीकियां अच्छी, कि दूरियाँ भली।
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शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

नयी सोच ... नयी कहानी

"नयी सोच ... नयी कहानी "
- Kailash Vaghela
            हम जब अपने आस पास होने वाली घटनाओ को देखते है तो हम उसे समजने के लिए सोचना शुरू करते है , की ये क्यों हुआ ? कैसे हुआ ? किसने किया ? ये सब सोचने लगते है .... इसके पीछे क्या कारण है? क्या हो सकता है ? ये सब हम सोचते है और सोचते सोचते हम इसके नतीजे तक पहुचने की कोशिश करते है और उसका समाधान क्या हो सकता है ये बात भी हम सोच लेते है .... ये ही तो ... यही हमारी कहानी बन जाती है .. इसे ही कहते है क्या सोचा और क्या किया जिसको जोड़ते-जोड़ते हम एक कहानी ही बना दिए ।


"
नयी द्रष्टि... नयी सोच... नए तरीके और नयी कहानी ।"

गुरुवार, 1 मार्च 2012

उठा ली है शमशीर

उठा ली है शमशीर
- Kaushalya

आँटी घूटी जीवन के रास्तो की,
जो मझिलों में बाधा डाले 
आ जाती है बिन बुलाई,
ध्येय से अपने विचलित करने,
ऐसी आनेवाली संभावनाओं को
अब परास्त करने हेतु
भर ली है गहरी साँस 
और उठा ली शमशीर 
 **
शब्दार्थ :
आँटी-घूटी = विपत्तियाँ, मुश्किल स्थिति, उलझने
बाधा = रूकावट
विचलित करना = गुमराह करना 
परास्त = असफल  करना 
शमशीर = तलवार 

बुधवार, 14 सितंबर 2011

अपने पथ से नहीं हटेंगे (14 सितंबर 2011,हिन्दी दिवस)

अपने पथ से नहीं हटेंगे
- Kaushalya


नहीं हटेंगे नहीं हटेंगे, अपने पथ से नहीं हटेंगे;
डटे रहेंगे डटे रहेंगे, अपने लक्ष्य पर डटे रहेंगे.


साहस के इस कठिन मार्ग पर, आगे बढ़ने से;
नहीं हटेंगे नहीं हटेंगे, अपने पथ से नहीं हटेंगे.


चल पड़े है करने साकार, देने अपने सपने को आकार;
नहीं हटेंगे नहीं हटेंगे, अपने पथ से नहीं हटेंगे.


पाने अपनी मंज़िल को, मुश्किलों से नहीं डरेंगे;
नहीं हटेंगे नहीं हटेंगे, अपने पथ से नहीं हटेंगे.


दुश्मनों की हो लंबी कतार, हम भी करेंगे सामना;
नहीं हटेंगे नहीं हटेंगे, अपने पथ से नहीं हटेंगे.


जितनी जुगत लगाले, चाहे जितना दम हो उसमे,
नहीं हटेंगे नहीं हटेंगे, अपने पथ से नहीं हटेंगे.


कर ले ज़ोर आँधी और तूफ़ान, अपने इरादों से अब हम,
नहीं हटेंगे नहीं हटेंगे, अपने पथ से नहीं हटेंगे.


भर अपने आत्मा में विश्वाश, पगभर भी अब तो,
नहीं हटेंगे नहीं हटेंगे, अपने पथ से नहीं हटेंगे.
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