जाना कहाँ ....
- Kaushalya
जाना कहाँ मालूम नहीं,
मंझील का पता नहीं,
ले जाये किस ओर....
ये कदम बढे जा रहे
अकेले है सफ़र में
फिर भी कोई ग़म नहीं
रस्ते में तूफ़ान का करेंगे सामना
लड़ लेंगे हर सितम से,
गर खुदाया तेरा साथ रहे
कोई ऋणानुबंध नहीं संसार से,
धुप- छाँव की पर्व नहीं,
ना किसी से कोई आश,
नाहीं किसी से गिले-शिकवे
बस अपनी धून में चलते ही जाये
मंझिल का पता नहीं
जाना कहाँ मालूम नहीं
कदम जिस ओर बढ़े
उस ओर बस चलते जाये
है जाना कहाँ मालूम नहीं
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