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मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

लगता है ऐसा

लगता है ऐसा
- Kaushalya
लगता है ऐसा...
जैसे, ज़मीन रुक सी गयी है...
हम थम से गए है
प्रकृति प्रगति के पथ पर है
ये कैसे हो सकता है !
एक साथ चलनेवाले दोनों
उसमे एक आगे और एक पीछे
कैसे हो सकता है फिर एक
कब हुआ ऐसा ?
जब किस्मत रूठ जाती है
खुशियाँ नजरे चुराती है
ख्वाबों को अग्निदाह लग जाता है
सोच मूक हो जाती है
चित्त चिंता चुरा जाती है
तारामंडल से एक सितारा बिखर जाता है
हर वफ़ा जब बेवफ़ा कहलाती है
मध्याहन में सूरज प्रखरता से जलता है
मोमबत्ती पिघलकर प्रवाही में बह जाती है
पतंगा परवाना बन,
दिये की लौ पर फ़ना हो जाता है
समन्दर की लहरों में जब सुनामी उठती है
फूल शाख से मुरझाकर गिर जाते है
पतझड़ के झोकों में पत्ते बिखर जाते है
लगता है ऐसा मानो..
कुदरत ने अपना विषाद,
आक्रोश के रूप में
खंडिता नायिका का चोला पहन लिया।
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