सोमवार, 27 जून 2011

नाम से बड़ा कर्म (बोधात्मक कथा)

"नाम से बड़ा कर्म" (बोधात्मक कथा)

-Kaushalya

तीन सहेलियाँ थी। जिनके नाम थे सोना, रूपा, और माला।
तीनों बचपन से साथ खेली और बड़ी हुई।
बड़े होते ही तीनों की शादी कर दी गई।
एक दिन जब तीनों सहेलियाँ मायके आई हुई थी तब एक-दूसरे से मिलने के लिए आतुर थी।
तीनों खुश दिखाई पड़ रही थी। काफ़ी वक्त के बाद जो मिल रही थी।
बातों – बातों में एक-दूसरे के पति के बारें में जानने के लिए उत्सुकता बताई।
इतने में रूपा बोल उठी – “अरी! अपने अपने पतिदेव के नाम तो बताओं, क्या नाम है उनके ?”
उसकी बात सुन सोना ने पहल दिखाई और कहने लगी – “मेरे पति का नाम लखपति है।”
उसका यह जवाब सुनकर रूपा ने भी बड़े चाऊ के साथ कहा – “मेरे पति का नाम तो धनवटी है।”
रूपा के पति का नाम सुनते ही सोना ने माला से प्रश्न किया कि – “अरी! माला तेरे पति का क्या नाम है ?”
माला ने शरमाते हुए हिचकिचाहट के साथ कहा – “मेरे पति का नाम ठठनगोपाल है।”
माला के पति का नाम सुनते ही सोना और रूपा हँसने लगी। उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहने लगी – अरी! ये भी भला कोई नाम है ‘ठठनगोपाल’।
माला तो शरम से पानी हुए जा रही थी। उसकी नज़रें शरम के भार से गरदन के साथ झुक गई।
इतने में सोना ने पूछ लिया कि – “ये तो बताना कि वो करते क्या है?”
भाई! मेरे पति तो जंगल से लकड़ियाँ काटकर लाते है और उसे बेचते है। उसी से हमारा घर चलता है।
गहरी सांस लेते हुए बोली कि - किसी दिन अगर लकड़ियाँ ना बीके तो खाने के लाले पड़ जाते है।
रूपा यह सुनते ही अपने पति के बारे में बताते हुए कहने लगी कि – “मेरे पति तो भीख मांगते है। जिस दिन भीख ना मिले उस दिन भूखे पेट सोना पड़ता है।”
फिर धीरे से रूपा ने माला से पूछा - तुम्हारा पति क्या करता है?
तो माला ने बड़े गर्व के साथ सर उठाकर इतराते हुए कहा कि – “मेरे पति मेहनत- मजदूरी करके कमाते है। इससे हमे दो टंक के खाने की रोटी जरुर मिल जाती है।”
माला मन-ही-मन मुस्कुरा रही थी।
वो सोच रही थी कि –
“लखपति बेचे लकडियाँ,
धनवटी मांगे भीख,
उससे तो मेरा ठठनगोपाल ठीक।”

जो मेहनती है, आलसी नहीं है। भरपेट खाना तो खिलाता है। किसी दिन खाना नहीं मिलेगा का डर तो नहीं।
सोना और रूपा की तरह लटकती हुई तलवार के जैसा तो जीवन नहीं है।
नाम अगर ‘ठठनगोपाल’ हुआ तो क्या है, मैं गर्व के साथ सिर उठाकर जी तो सकती हूँ।
और तीनों सहेलियाँ शाम हो जाने कि वजह से अपने-अपने घर को लौट गई।
*_*
बोध :- नाम कोई भी हो, कैसा भी क्यों न हो, किन्तु नाम के आगे कर्म महान होता है। जो हमे इज्जत से सर उठाकर जीने का जीवन और चैन की नींद देता है।

गुरुवार, 6 मई 2010

"सास्वत कुछ नहीं" (प्रेरक कथा)

"सास्वत कुछ नहीं" (प्रेरक कथा)
- Kaushalya

एक नगर में एक साधू महात्मा आए हुए थे। राजा जी ने जब ये बात सुनी तब उनहोंने साधू महात्मा को राजमहल पधारने के लिए निमंत्रण भीजवाया। साधू जी ने राजा जी का निमंत्रण स्वीकार कर राजमहल पहुंचे।

राजा जी ने उनके स्वागत में हो सके उतनी सारी सेवायें दी।

साधू जी अब वहां से जाने लगे तब राजा जी ने उनको विनती की की - "कुछ सिख देते जाएँ"

तब साधू महात्मा ने उनके हाथों में एक कागज़ की बन्ध पर्ची देते हुए कहा की - " इसे तब खोलना जब आप पर बहुत भारी संकट या मुश्किल आन पड़े"

इतना कह कर साधू ने राजा जी से विदा ली।

कुछ सालों बाद राजा जी के नगर पर दुसरे राजा ने चडाई कर दी।

इस युद्ध के दौरान उनकी सारी सम्पति और राज खजाना सब खर्च हो गया।

तब राजा जी को वो साधू महात्मा की दी हुई पर्ची याद आयी...

उनहोंने पलभर की भी देर किए बगैर वो पर्ची को खोला।

उस में लिखा था - " यह भी नहीं रहेगा"

राजा सब समझ गए। अभी उनका बुरा वक्त चल रहा है। यह ज्यादा दिन नहीं रहेगा।

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[बोध :- सुख-दुहाख हो या मुश्किल परिस्थिति यह सब स्थायी नहीं है । उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए। ]


बुधवार, 28 अप्रैल 2010

"चाबीयां किसे दू!....." (कहानी)

"चाबीयां किसे दू!....." (कहानी)
-Kaushalya

एक वयोवृद्ध थे। उनका हरा-भरा परिवार था। परिवार में तीन बेटे और तीन बहुएँ थी। एक दिन उन्होंने सोचा की मेरे बाद ये सब धरोहर कौन संभालेगा। यह सोचकर उन्होंने अपने बच्चों की परीक्षा लेने का सोचा और किसे चाबीयां सोंपे उसका निर्णय उसी परीक्षा के परिणाम पर निर्धारित किया।

वृद्ध ने एक युक्ति की और तीनो बेटे-बहुओं को बुलवाया और अपने पास जो थोड़े बहुत गेहूँ थे उसके तीन बरा-बर हिस्से किये और तीनो बेटों में बाँट दिया। फिर कहा - "मैं भारत दर्शन के लिए जा रहा हूँ , वो इस गेहूँ को तब तक संभाल कर रखें।"

फिर वृद्ध यात्रा के लिए घर से निकाल पड़े। उनके जाते ही तीनो बेटे-बहुएँ अपना-अपना हिस्सा लेकर चले गए।

बड़ी बहु ने सोचा कि - "बापूजी यात्रा से लौटते ही गेहूँ का हिसाब मांगेंगे। इसलिए, इसे सँभाल कर सुरक्षित जगह पर रख देते है।"

मझली बहु ने तर्क लगाया कि - "इतने गेहूँ को क्या सँभालना, यूँ तो ये पड़े रहेंगे इससे तो अच्छा है इसका भोजन बनाया जाए, जिससे पेट भरेगा और इसका सही उपयोग होगा।"

अब तीसरी बहु सोच रही है कि - "यदि ये गेहूँ ऐसे ही पड़े रहेंगे तो इसमें कीड़े हो जायेंगे। क्यूँना इसे खेत में बोया जाए।"

इस प्रकार तीनो बहुओं ने अपनी-अपनी सूझ-बुझ से गेहूँ का सुरक्षित करने का उपाय ढूंढ़ लिया।

पुरे एक साल बाद यात्रा से जब बापूजी वापस आए। तब उन्होंने तीनो बहुओं और बेटों को बुलवाया और उस दिये हुए गेहूँ का क्या किया यह पूछा।

बड़े बेटे और बहु को पूछा तो - बड़ी बहु जाकर जहाँ पर गेहूँ संभालकर रखे थे वहाँ से ले आयी। बापूजी ने देखा की गेहूँ में कीड़े पड़ कर सड़ गए है।

दुसरे बेटे-बहु को पूछने पर कहा कि - वो पका कर भोजन बना दिये गए है तो समाप्त हो गए है।

अब तीसरे बेटे-बहु को पूछा गया तो उन्होंने कहा कि - "बापूजी, गेहूँ को लाने के लिए 10-12 बैल गाड़ियाँ भेजनी पड़ेगी, तब वो आ सकेंगे।"

बापूजी ने आश्चर्य से पूछा - "वो कैसे ?"

तब छोटी बहु ने कहा कि - " गेहूँ को खेत में बोया गया था, जो आज चार गुना हो गए है। इसलिए, उन्हें लाने के लिए बैल गाड़ी कि जरुरत पड़ेगी।"

यह सब देखने और सुनने के बाद बापूजी ने गेहूँ और यात्रा के रहस्य की बात उदघाटित करते हुए घटस्फोट किया कि, उनकी इस "योग्यता की कसौटी" का निष्कर्ष यह निकालता है कि इस कसौटी में छोटी बहु उतीर्ण हुई है।

अन्त में, बापूजी ने छोटी बहु की समझदारी की दाद देते हुए चाबियों वाला झुमका छोटी बहु को सोंप दिया।

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मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

अकलमंद पुत्रवधू (कहानी)


अकलमंद पुत्रवधू (कहानी)
- Kaushalya
एक किसान था। इस बार फसल कम होने की वजह से चिंतित था। घर में राशन ग्यारह महीने चल सके उतना ही था। बाकी एक महीने का राशन कैसे लायेगा, कहाँ से इसका इंतजाम होगा यह चिंता उसे बार-बार सता रही थी।

किसान की पुत्रवधू ने यह ध्यान दिया कि पिताजी किसी बात को लेकर परेशान है। पुत्रवधू ने किसान से पूछा कि - "क्या बात है, पिताजी ? आप इतना परेशान क्यों है ?"

तब किसान ने अपनी चिंता का कारण पुत्रवधू को बताया कि - "इस साल फसल कम होने कि वजह से ग्यारह महीने चल सके उतना ही राशन है। बाकी एक महिना कैसे गुजरेगा यही सोच रहा है ?"

किसान की यह बात सुनकर पुत्रवधू ने थोडा सोचकर कहा - "पिताजी, आप चिंता ना करे, बेफिक्र हो जाए, उसका इंतजाम हो जायेगा।"

ग्यारह महीने बीत गए, अब बारहवा महिना भी आराम से पसार हो गया। किसान सोच में पड़ गया कि - "घर में अनाज तो ग्यारह महीने चले उतना ही था, तो ये बारहवा महिना आराम से कैसे गुजरा ?"

किसान ने अपनी पुत्रवधू को बुलवाकर पूछा - "बेटी, ग्यारह महीने का राशन बारहवे महीने तक कैसे चला ? यह चमत्कार कैसे हुआ ?"

तब पुत्रवधू ने जवाब दिया कि - "पिताजी, राशन तो ग्यारह महीने चले उतना ही था। किन्तु, जिस दिन आपने अपनी चिंता का कारण बताया... उसी दिन से रसोई के लिए जो भी अनाज निकालती उसी में से एक-दो मुट्ठी हररोज वापस कोठी में दाल देती। बस उसी की वजह से यह बारहवे महीने का इंतजाम हो गया। और बिना तकलिफ़ के बारहवा महिना आराम से गुजर गया।"

किसान ने यह बात सुनी तो दंग सा रह गया । और अपनी पुत्रवधू की बचत समझदारी की अकलमंदी पर गर्व करने लगा।
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बुधवार, 31 मार्च 2010

क्रान्तिकारी बना दिया (Dedicate on 31 March)

क्रान्तिकारी बना दिया
- Kaushalya

क्यों जिंदगी सरल नहीं होती,
क्यों अपने अधिकार हक़ से नहीं मिलते,
जीवन की आपाधापी (Onslaught) ने आज,
हमे क्रान्तिकारी बना दिया।
?
ये संघर्षमय जीवन ने हमे,
हर कदम अस्तित्व के लिए ,
लड़कर जीना सिखा दिया,
हमे क्रान्तिकारी बना दिया।
?
यही है वास्तविकता जीवन की,
ना मिले माँगने से तो,
छिन कर जीना सिखा दिया,
हमे क्रान्तिकारी बना दिया
?
क्या जिंदगी का दस्तूर है ऐसा,
सीधे मनुज हो उनको ही सताना,
अन्याय और धोखे ने आज,
हमे क्रान्तिकारी बना दिया।
?
जहाँ धरा है मौन हमने,
वहीँ पर गुनहगार ठहरा दिया,
न्याय मिलने की जिज्ञासा ने,
हमे क्रान्तिकारी बना दिया।
?
क्या कहे अंतर विषाद को,
जिंदगी की ठोकरों ने आज,
ज़माने की नज़रों में,
क्रान्तिकारी बना दिया।
? ? ?
(यह रचना मन: क्रांति पर आधारित है)