शनिवार, 20 मार्च 2010

बेटियाँ (20 March Daughter Day)

बेटियाँ (२० मार्च बेटियाँ दिवस)
- Kaushalya
नन्ही सी कली होती है बेटियाँ..
फूलों जैसी कोमल होती है ये..
कभी दादा जी की लाडली..
तो कभी पापा की परी,
माँ की दुलारी होती है,
तो कभी..
भैया की नन्नी सी राजकुमारी,
बहन की सखी होती है..
तो कभी सहेलियों की प्यारी..
बेटियाँ चहकती हुई चिड़ियाँ है,
जिसकी चहक से आँगन गूंज उठता है..
उसकी बोली से,..
खुशियों की बरसात होती है..
बेटियाँ हमारा ह्रदय होती है..
जिसे देखकर मन आत्मतृप्त होता है..
ऐसी होती है बेटियाँ..
*

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

पल भर का 'इन्तज़ार'

पल भर का 'इन्तज़ार'
- Kaushalya

इंतज़ार करे कोई,...
ये गवारा नहीं हमे..
यूँ तो इन्तज़ार में,..
इन्तेहाँ हो जाती है,..
ख़ामोश सब्र की..
इक पल भी देर हो जाए,..
गर वक़्त के तकाज़े की..
बेचेन कर देती है,..
पल भर के लिए..
मचल उठता है जिया,..
आ जाती है ओट,..
जस्बातों के बाँध पर..
इंतज़ार की ये घडी,..
लगती है बड़ी भारी..
कैसे बचे कोई,..
इसके सितम से..
या तो कहीं,..
जाता लम्हा थम सा जाए..
या तो फिर,..
आनेवाले आ जाए..
तब होगी ख़त्म ये,..
'इन्तज़ार' की लड़ी..
*

गुरुवार, 11 मार्च 2010

रूठे दोस्तों को..

रूठे दोस्तों को..
- Kaushalya

ए दोस्त ........
दोस्तों से यूँ रूठा नहीं करते....
यूँ दोस्ती को हरदम आज़माया नहीं करते...
सच्ची दोस्ती मिलती है नसिब वालों को...
हर कदम यूँ किश्मत आज़माया नहीं करते...
यूँ तो कहने के दोस्त तो मिल जाते है कई,
हजारों मोड़ है जिंदगी के रास्ते में ......
जिंदगी के ये हँसीन अनमोल पल को
यूँ दोस्तों से रूठ कर गवाया नहीं करते..
जो मिला है उसे खुदा कि नेमत समझना...
मन्नते करने से भी नहीं मिलती दोस्ती..
कभी दिल्लगी ना करना ... आज़माईश कि..
पतझड़ के पत्तो कि तरह बिखर जाएगी..
लाख कोशिषे करलो फिर..
दुर्लभ है ये..
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मंगलवार, 12 जनवरी 2010

તુચ્છ જીવાત્મા (Gujarati)

તુચ્છ જીવાત્મા
- Kaushalya
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હે જીવાત્મા
જરા વિચાર કરી લે
તારા નિજ હલકા કર્મ થી
તારું કર્મ નું ભાથું ન બાંધ
પ્રભુ ના જનને સતાવવાનું છોડી દે
એટલું જાણ કે
આજે કરેલા કર્મ તારા
આવતી કાલે સંચિત થયી
પ્રારબ્ધ બની ફરી વળશે
ત્યારે તારું કઈ નહિ ચાલે
ત્યાં તારા બુદ્ધિના તર્કો નકામાં થાશે
સ્વાર્થી બુદ્ધિ સાથ નહીં આપે
જરા વિચાર કરી લે
સંતો ની વાણી છે
જેનું ઘર કાચ નું હોય,
તે બીજાના ઘર પર પથ્થર નો મારે
હે તુચ્છ જીવાત્મા
તને સંતોષ ક્યાંય નહીં મળે
તારા મનને શાંતિ ક્યાંય નહીં મળે
તારા હૈયાને હામ નહીં મળે
ન્યાયના દેવતાનો ખૌફ રાખ
નહીં તો તારા કર્મો જ
તારી અધોગતિનું મૂળ કારણ બનશે.
જરા વિચાર કરી લે
તારે કઈ દિશામાં પગ માંડવા
અધોગતિ કે ઉત્થાન તરફ
એક ક્ષણ માટે થોભી જા
અને દ્રષ્ટિપાત કર આ સૃષ્ટિ પર
નથી રહ્યા રાવણ ના રાજ,
નથી રહી કંસ ની નગરી,
નથી રહી હિરણ્યકશ્યપ ની હસ્તી,
નથી રહી શકુની ની સત્તા,
ઉદાહરણ લે ઈતિહાસ થી
ચિરસ્થાયી ને સાસ્વત છે શું.
જરા વિચાર કરી લે
તું સમજે.. તું છલે છે જગને
પરંતુ હકીકત તો એ છે કે
જગની આડમાં તું પોતાની જાતને જ છલે છે
હે જીવાત્મા
જરા વિચાર કરી લે
જે સુખની મહેચ્છાથી કરે તું આ કર્મ
એ સુખ નહીં આવે સાથે તારી
કાળ બની મુત્યુ જયારે આવશે
નહિ ચાલે તારી દલીલો
સગા-સંબંધી સ્મશાન સુધી છોડશે
ઘરના તારા મહિનો અશ્રુ વહાવશે
ત્યારબાદ ભૂલી જશે તુજને હર કોઈ
ફક્ત આવશે સાથે તારા કર્મ
ત્યારે તારા કર્મોનું સરવૈયું નીકળશે.
માટે સમજી જા
હે જીવાત્મા
દુષ્કર્મો ત્યજી સત્કર્મો કર..
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અસ્તુ

" वाणी बनी पहचान.. " " (बोध-कथा)

(बोध-कथा)
" वाणी बनी पहचान.. "
- Kaushalya
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एक दिन पास के जंगल में राजा जी शिकार करने के लिए अपने वज़ीर और सिपाही के साथ गए। शिकार की ढूंढ़ में तीनो बिछड़ गए। एक-दुसरे की शोध में वो आगे बढे।
आगे चलकर सिपाही को पेड़ के नीचे एक आदमी दिखा। सिपाही ने देखते ही उस दिशा में आगे कदम बढ़ाये। वह आदमी द्रष्टिहीन था।
सिपाही ने उसे पूछा - 'ए अंधे, तूने यहाँ से किसी को जाते हुए देखा।'
उस आदमी ने जवाब दिया - 'नहीं, यहाँ से कोई नहीं गया है।'
सिपाही ने कहा - 'ठीक है ठीक है।'
और उसके बाद सिपाही आगे की ओर चल पड़ा।
थोड़ी ही देर में उस जगह पर वज़ीर ढूंढता हुआ जा पहुँचा।
वज़ीर ने उस आदमी से पूछा - 'प्रज्ञावान जी, यहाँ से कोई पसार हुआ है ?'
उस आदमी ने जवाब दिया - 'हाँ, यहाँ से थोड़ी देर पहले एक आदमी गया है।'
वज़ीर ने धन्यवाद कहा और आगे बढे।
सिपाही और वज़ीर के जाने के बाद वहाँ ढूंढते हुए राजा जी आ पहुंचे।
राजा ने उस आदमी से पूछा - 'हे सूरदास, यहाँ आपके पास ढूंढते हुए कोई मुसाफिर आया था।'
उस आदमी ने जवाब दिया - 'हाँ राजन, यहाँ से थोड़ी देर पहले आपका सिपाही गुजरा है और उसके बाद आपके वज़ीर गुजरे है।'
यह सुनते ही राजा आश्चर्य चकित हो गए। और उत्सुक्त हो गए यह जानने के लिए कि एक द्रष्टिहीन व्यक्ति को कैसे पहचान हुई कि पहले आया वो सिपाही था और दूसरा गुजरा वो वज़ीर ही है।
राजा जी की इस कश्मकश का समाधान करते हुए उस द्रष्टिहीन आदमी ने जवाब दिया कि - हे राजन, मुझे उनके कथोपकथन से पहचान हुई कि वो कोन था।
इस
प्रकार हमे इस कहानी से बोध मिलता है कि कैसी वाणी प्रयोग करनी चाहिए। क्योंकि वाणी ही हमारी पहचान बनाती है।
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- Kaushalya