बुधवार, 28 अप्रैल 2010

"चाबीयां किसे दू!....." (कहानी)

"चाबीयां किसे दू!....." (कहानी)
-Kaushalya

एक वयोवृद्ध थे। उनका हरा-भरा परिवार था। परिवार में तीन बेटे और तीन बहुएँ थी। एक दिन उन्होंने सोचा की मेरे बाद ये सब धरोहर कौन संभालेगा। यह सोचकर उन्होंने अपने बच्चों की परीक्षा लेने का सोचा और किसे चाबीयां सोंपे उसका निर्णय उसी परीक्षा के परिणाम पर निर्धारित किया।

वृद्ध ने एक युक्ति की और तीनो बेटे-बहुओं को बुलवाया और अपने पास जो थोड़े बहुत गेहूँ थे उसके तीन बरा-बर हिस्से किये और तीनो बेटों में बाँट दिया। फिर कहा - "मैं भारत दर्शन के लिए जा रहा हूँ , वो इस गेहूँ को तब तक संभाल कर रखें।"

फिर वृद्ध यात्रा के लिए घर से निकाल पड़े। उनके जाते ही तीनो बेटे-बहुएँ अपना-अपना हिस्सा लेकर चले गए।

बड़ी बहु ने सोचा कि - "बापूजी यात्रा से लौटते ही गेहूँ का हिसाब मांगेंगे। इसलिए, इसे सँभाल कर सुरक्षित जगह पर रख देते है।"

मझली बहु ने तर्क लगाया कि - "इतने गेहूँ को क्या सँभालना, यूँ तो ये पड़े रहेंगे इससे तो अच्छा है इसका भोजन बनाया जाए, जिससे पेट भरेगा और इसका सही उपयोग होगा।"

अब तीसरी बहु सोच रही है कि - "यदि ये गेहूँ ऐसे ही पड़े रहेंगे तो इसमें कीड़े हो जायेंगे। क्यूँना इसे खेत में बोया जाए।"

इस प्रकार तीनो बहुओं ने अपनी-अपनी सूझ-बुझ से गेहूँ का सुरक्षित करने का उपाय ढूंढ़ लिया।

पुरे एक साल बाद यात्रा से जब बापूजी वापस आए। तब उन्होंने तीनो बहुओं और बेटों को बुलवाया और उस दिये हुए गेहूँ का क्या किया यह पूछा।

बड़े बेटे और बहु को पूछा तो - बड़ी बहु जाकर जहाँ पर गेहूँ संभालकर रखे थे वहाँ से ले आयी। बापूजी ने देखा की गेहूँ में कीड़े पड़ कर सड़ गए है।

दुसरे बेटे-बहु को पूछने पर कहा कि - वो पका कर भोजन बना दिये गए है तो समाप्त हो गए है।

अब तीसरे बेटे-बहु को पूछा गया तो उन्होंने कहा कि - "बापूजी, गेहूँ को लाने के लिए 10-12 बैल गाड़ियाँ भेजनी पड़ेगी, तब वो आ सकेंगे।"

बापूजी ने आश्चर्य से पूछा - "वो कैसे ?"

तब छोटी बहु ने कहा कि - " गेहूँ को खेत में बोया गया था, जो आज चार गुना हो गए है। इसलिए, उन्हें लाने के लिए बैल गाड़ी कि जरुरत पड़ेगी।"

यह सब देखने और सुनने के बाद बापूजी ने गेहूँ और यात्रा के रहस्य की बात उदघाटित करते हुए घटस्फोट किया कि, उनकी इस "योग्यता की कसौटी" का निष्कर्ष यह निकालता है कि इस कसौटी में छोटी बहु उतीर्ण हुई है।

अन्त में, बापूजी ने छोटी बहु की समझदारी की दाद देते हुए चाबियों वाला झुमका छोटी बहु को सोंप दिया।

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मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

अकलमंद पुत्रवधू (कहानी)


अकलमंद पुत्रवधू (कहानी)
- Kaushalya
एक किसान था। इस बार फसल कम होने की वजह से चिंतित था। घर में राशन ग्यारह महीने चल सके उतना ही था। बाकी एक महीने का राशन कैसे लायेगा, कहाँ से इसका इंतजाम होगा यह चिंता उसे बार-बार सता रही थी।

किसान की पुत्रवधू ने यह ध्यान दिया कि पिताजी किसी बात को लेकर परेशान है। पुत्रवधू ने किसान से पूछा कि - "क्या बात है, पिताजी ? आप इतना परेशान क्यों है ?"

तब किसान ने अपनी चिंता का कारण पुत्रवधू को बताया कि - "इस साल फसल कम होने कि वजह से ग्यारह महीने चल सके उतना ही राशन है। बाकी एक महिना कैसे गुजरेगा यही सोच रहा है ?"

किसान की यह बात सुनकर पुत्रवधू ने थोडा सोचकर कहा - "पिताजी, आप चिंता ना करे, बेफिक्र हो जाए, उसका इंतजाम हो जायेगा।"

ग्यारह महीने बीत गए, अब बारहवा महिना भी आराम से पसार हो गया। किसान सोच में पड़ गया कि - "घर में अनाज तो ग्यारह महीने चले उतना ही था, तो ये बारहवा महिना आराम से कैसे गुजरा ?"

किसान ने अपनी पुत्रवधू को बुलवाकर पूछा - "बेटी, ग्यारह महीने का राशन बारहवे महीने तक कैसे चला ? यह चमत्कार कैसे हुआ ?"

तब पुत्रवधू ने जवाब दिया कि - "पिताजी, राशन तो ग्यारह महीने चले उतना ही था। किन्तु, जिस दिन आपने अपनी चिंता का कारण बताया... उसी दिन से रसोई के लिए जो भी अनाज निकालती उसी में से एक-दो मुट्ठी हररोज वापस कोठी में दाल देती। बस उसी की वजह से यह बारहवे महीने का इंतजाम हो गया। और बिना तकलिफ़ के बारहवा महिना आराम से गुजर गया।"

किसान ने यह बात सुनी तो दंग सा रह गया । और अपनी पुत्रवधू की बचत समझदारी की अकलमंदी पर गर्व करने लगा।
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बुधवार, 31 मार्च 2010

क्रान्तिकारी बना दिया (Dedicate on 31 March)

क्रान्तिकारी बना दिया
- Kaushalya

क्यों जिंदगी सरल नहीं होती,
क्यों अपने अधिकार हक़ से नहीं मिलते,
जीवन की आपाधापी (Onslaught) ने आज,
हमे क्रान्तिकारी बना दिया।
?
ये संघर्षमय जीवन ने हमे,
हर कदम अस्तित्व के लिए ,
लड़कर जीना सिखा दिया,
हमे क्रान्तिकारी बना दिया।
?
यही है वास्तविकता जीवन की,
ना मिले माँगने से तो,
छिन कर जीना सिखा दिया,
हमे क्रान्तिकारी बना दिया
?
क्या जिंदगी का दस्तूर है ऐसा,
सीधे मनुज हो उनको ही सताना,
अन्याय और धोखे ने आज,
हमे क्रान्तिकारी बना दिया।
?
जहाँ धरा है मौन हमने,
वहीँ पर गुनहगार ठहरा दिया,
न्याय मिलने की जिज्ञासा ने,
हमे क्रान्तिकारी बना दिया।
?
क्या कहे अंतर विषाद को,
जिंदगी की ठोकरों ने आज,
ज़माने की नज़रों में,
क्रान्तिकारी बना दिया।
? ? ?
(यह रचना मन: क्रांति पर आधारित है)

सोमवार, 29 मार्च 2010

कब आयेगा वो दिन..(When that day comes..)

कब आयेगा वो दिन..
- Kaushalya
कब आयेगा नवोदित सूरज..
चारों ओर प्रसरेगी शांति..
न रहेगा कोई बैरी-दुश्मन..
न रहेगी अंतर की आग (Jealousy)..
चारों ऋतुएं होंगी सुख से भरपूर..
न रहेगा कोई वाणी-विग्रह..
कब होगा सुनहरा हर पल..
जहाँ होगी स्नेह की संपत्ति..
जहाँ हो मानवता का भाईचारा..
कब होगी सफलता से प्रगति..
कब होगा ऐसा..
भूखे पेट ना सोयेगा कोई..
महंगाई का होगा ना मार..
कब होगा पैसों के मूल्यों का क्षय..
कब होगी पुरुषोत्तम की पूरी परिकल्पना..
कब आयेगा वसुधैव कुटुम्बकम का राज..
कब मिटेगी मन् की मलिनताएँ..
कब मिटेगा धार्मिकता के नाम का पाखंड..
कब होंगे सब धर्म एक समान..
..जहाँ..
ना रहेगा कोई ऊंच-निच का भेद..
ना होंगे दंगे-फसात का खेल..
ना होगा अन्याय किसीसे..
..जाने..
कब होगा नव युग का निर्माण..
कब होगा यह स्वप्न साकार..
कब आयेगा नव सूरज..
आह्ह्ह...
आखिर, कब आयेगा वो दिन..
,...

बुधवार, 24 मार्च 2010

राम के अनुरागी.. (रामनवमी)

राम के अनुरागी.. (रामनवमी)
- Kaushalya
राम मेरे मन में बसनेवाले है..
मेरे हर रोम में राम समाये है..
मेरे जीवन सहारे राम है..
मेरे दर्पण और अर्चन राम है..
मेरी जिह्वा भी 'राम' नाम ही रटती है..
अनुलोम-विलोम होनेवाली साँसें भी राम है..
मेरे शक्ति और स्मरण राम है..
मेरी भक्ति और भरोसा राम है...
मेरा हर कर्म राममय है..
दीवाने है राम नाम के..
सुख-दुःख नहीं रहा अब तो..
हरख-शोक भी नहीं है..
राममय हो गया है सबकुछ..
उपवन बन गए है राम के..
नहीं रहा अब क्रोध किंचित मात्र..
हर लिया है सबकुछ राम नाम ने..
राम ने मुक्त कर दिया संसार से..
सार्थक हो गया जनम..
निर्मल हो गए निर्गुण को पाकर..
कैसे कहे महिमा राम नाम की..
अनंत है परमानन्द की गुणगाथा..
कैसे कहे अनुभव राम नाम का..
एक बार राम नाम प्रयोग कर देखें,
खुद-ब-खुद परिचित हो जायेंगे...
राम नाम है अति मंगलकारी..
'जय श्री राम'
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