सोमवार, 27 जुलाई 2009

तुम ही हो

  • तुम ही हो

- Kaushalya

  • तुम्ही हो कल्पना मेरी, सपना भी तुम ही हो।
  • तुम ही हो प्रेरणा मेरी, मंज़िल भी तुम ही हो।
  • तुम ही हो आस्था मेरी, विश्वास भी तुम ही हो।
  • तुम ही हो खुशियाँ मेरी, भावना भी तुम ही हो।
  • तुम ही हो ख्वाहिश मेरी, चाहत भी तुम ही हो।
  • तुम ही हो दुआ मेरी, परमेश्वर भी तुम ही हो।
  • तुम ही हो ज़िन्दगी मेरी, सब कुछ मेरा तुम ही हो।
  • ..... बोले तो.....
  • तुम से ही है मेरा जहान रोशन।
  • *

रविवार, 26 जुलाई 2009

जवाब आयेगा

जवाब आयेगा
- Kaushalya
यूँही खत लिख दिया उनके नाम
जानते है हम कि
जवाब आएगा नहीं
फिर भी, इंतज़ार में है
सोचते है कि,
उन्होने लिफाफ़ा खोला होगा भी या नहीं
मन तो कहता है,
ज़रूर पढ़ा होगा खत
और मुस्कुराए होंगे वो
कौन जाने, क्या है हक़ीकत
मन बैचेन है,
कहीं खत पढ़कर वो नाराज़ ना हो जाए,
फिर भी, एक सुकून है,
ख़त पढ़ा तो होगा ।
बस यही काफ़ी है हमारे लिए
कोई उम्मीद नहीं रखी
के जवाब आयेगा
फिर भी तमन्ना ये रखते है
के जवाब आ जाए
कौन जाने,
क्या है उनके दिल में,
कुच्छ ख़बर नहीं
मन कहता है,
थोड़ा ठहर जा, ज़रा सा रुक जा,
इतना ही सही, तोड़ा और इंतज़ार कर ले
ज़रूर कुच्छ ना कुच्छ संकेत आयेगा उनका
जवाब ना आए तो कोई ग़म नहीं,
उन तक खत पहुँचा.. यही बहुत है
फिर भी, मन करता है,....
कि जवाब आ जाए....
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कौन है हम उनके

कौन है हम उनके
- Kaushalya
वो पुच्छ रहे हम से
कौन है हम....
क्या जवाब दे उनको कि,
कौन है हम उनके....
कोई जाए और उनसे कहे कि,
उनके पास से गुजरनेवाली हवा है हम
साँसों मे जो घुल जाए वो खुश्बू है हम
उनके हृदय में छीपी चाहत है हम
तन्हाइयों मे आनेवाली याद है हम
उनके ग़म में बहनेवाले आँसू है हम
कोई जाए और कहे उनसे कि,
कौन है हम....
उनके इर्द-गिर्द होनेवाली,
चहल-पहल के साक्षी है हम
उनको होनेवाले एहसास की अनुभूति है हम
उनके दिल मे धड़कनेवाली धड़कन है हम
उनके जीवन में ,
मेघधनुषी रंगो का रंग है हम
कोई जाए और कहे उनसे..
कि कौन है हम उनके....
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शनिवार, 25 जुलाई 2009

इलज़ाम है हम पर

इलज़ाम है हम पर
- Kaushalya
वो कहते है....
चुराया है हमने उनका नाम
इतना बड़ा इलज़ाम लगाया हमारे नाम
जैसे हमने....
आसमान के तारों को चुराकर, अपना दामन सजा लिया ।
फूलों से उसकी खुश्बू चुराकर, उनका नाम परिमल रख दिया ।
जैसे क्षीर सागर से मूल्यवान रत्न चुराकर,
उनका नाम अनमोल रख दिया
बन की खामोशी चुराकर, उनका नाम वनराज रख दिया
झीलों की शान्ति चुराकर, उनका नाम अमन रख दिया
जुगनुओं की रोशनी चुराकर, उनका नाम रोनक रख दिया
आकाश की विशालता चुराकर, उनका नाम अम्बर रख दिया
झूमते बादल की आकृति चुराकर, उनका नाम स्वरुप रख दिया
चंद्रमा की शीतल चाँदनी चुराकर, उनका नाम ब्रीजेश रख दीया
ेदों की ऋचाओं ने अवतार लिया
ओमकार के रूप में , और
ओमकार का नाद चुराकर, उनका नाम सोहम् रख दिया
कमल की कोमलता चूराकर, उनका नाम पुष्कर रख दिया
पर्वतो का अल्लड़पन चुराकर, उनका नाम हिमालय रख दिया
रिश्तो की नजाकत चुराकर, उनके साथ रिश्ता जोड़ लिया
ह्रदय की भावनाओं से चाहत चुराकर
उनका नाम प्रेम रख दिया
....क्या सही किया,....
उन्होंने हम पर नाम चुराने का
यह इलज़ाम लगाकर
हमे गुनाहगार का खिताब दे दिया।
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हम-तुम

हम-तुम
- Kaushalya
आपका आना लगता है कैसा
सच कहु या चुप रहु
कुच्छ समझ में ना आए
कैसी मुश्किल है ये
जानते है वो भी
और जानते है हम भी
नहीं बोले गये जो शब्द
आप बताए हल इसका क्या
मन में खुश है वो भी
पर है खामोश खड़े
ये देखते ही
इतराते है हम भी
जादू है जैसे कोई
उनके आगमन में..
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