लगता है ऐसा
- Kaushalya
लगता है ऐसाजैसे, ज़मीं रुक सी गयी है
हम थम से गए है
प्रकृति प्रगति के पथ पर है
ये कैसे हो सकता है
एक साथ चलनेवाले दोनों
उसमें एक आगे और एक पीछे
कैसे हो सकता है फिर एक
कब हुआ ऐसा..
जब किश्मत रूठ जाती है
खुशियाँ नज़रे चुराती है
ख्वाबों को अग्निदाह लग जाता है
सोच मूक हो जाती है
चित्त चिंता चुरा जाती है
तारामंडल से एक सितारा बिखर जाता है
हर वफ़ा जब बेवफ़ा कहलाती है
मध्याहन में सूरज प्रखरता से चलता है
मोमबत्ती पिघलकर प्रवाही में बह जाती है
पतंगा परवाना बन,
दिये की लौ पर फ़ना हो जाता है
समन्दर की लहरों में जब सुनामी उठती है
फूल डाली से मुरझाकर गिर जाते है
पतझड़ के झोंकों में पत्ते बिखर जाते है
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