शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

लगता है ऐसा

लगता है ऐसा
- Kaushalya
लगता है ऐसा
जैसे, ज़मीं रुक सी गयी है
हम थम से गए है
प्रकृति प्रगति के पथ पर है
ये कैसे हो सकता है
एक साथ चलनेवाले दोनों
उसमें एक आगे और एक पीछे
कैसे हो सकता है फिर एक
कब हुआ ऐसा..
जब किश्मत रूठ जाती है
खुशियाँ नज़रे चुराती है
ख्वाबों को अग्निदाह लग जाता है
सोच मूक हो जाती है
चित्त चिंता चुरा जाती है
तारामंडल से एक सितारा बिखर जाता है
हर वफ़ा जब बेवफ़ा कहलाती है
मध्याहन में सूरज प्रखरता से चलता है
मोमबत्ती पिघलकर प्रवाही में बह जाती है
पतंगा परवाना बन,
दिये की लौ पर फ़ना हो जाता है
समन्दर की लहरों में जब सुनामी उठती है
फूल डाली से मुरझाकर गिर जाते है
पतझड़ के झोंकों में पत्ते बिखर जाते है
....

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

जब भी जी चाहे

जब भी जी चाहे
- Kaushalya
जब भी जी चाहे
मुझे तुम यादों में बुला लेना
सपना बन ना आऊं तो कहना

जब भी जी चाहे
तुम मुझे आवाज़ देना
पवन लहरी बन ना आऊं तो कहना

जब भी जी चाहे
तुम मेरी ख्वाहिश करना
अपना न बन जाऊँ तो कहना
*

सोमवार, 7 सितंबर 2009

जाना कहाँ ....

जाना कहाँ ....
- Kaushalya
रास्ता धूंधला है,
जाना कहाँ मालूम नहीं,
मंझील का पता नहीं,
ले जाये किस ओर....
ये कदम बढे जा रहे
अकेले है सफ़र में
फिर भी कोई ग़म नहीं
रस्ते में तूफ़ान का करेंगे सामना
लड़ लेंगे हर सितम से,
गर खुदाया तेरा साथ रहे
कोई ऋणानुबंध नहीं संसार से,
धुप- छाँव की पर्व नहीं,
ना किसी से कोई आश,
नाहीं किसी से गिले-शिकवे
बस अपनी धून में चलते ही जाये
मंझिल का पता नहीं
जाना कहाँ मालूम नहीं
कदम जिस ओर बढ़े
उस ओर बस चलते जाये
है जाना कहाँ मालूम नहीं
**

" राम "

" राम "
- Kaushalya
राम तेरा नाम, तेरा नाम_
एक जीने की सच्ची राह दिखता है,_
दूजा जीवन का उद्देश्य बताता है,_
वन में अहल्या का श्राप मुक्तकर,_
अपनी करुणा दिखाई ।_
पिता वचन की लाज रखकर,_
रघुकुल रीति निभाई।_
सीता का वरण करके,_
प्रीत की रित निभाई।_
भरत को राजगद्दी सोंपकर,_
भातृ के प्रति स्नेह बताया।_
चौदा वर्ष बनवास भोगकर,_
प्रभु ने त्याग की रीत शिखायी।_
मंथरा के अपराध को क्षमा कर,_
करूणानिधि ने क्षमा दान शिखलाया।_
गुहु को नदिया पार का मूल्य चुकाकर,_
शिष्टाचार से व्यवहार धर्म निभाया।_
शबरी के जुठे बेर खाकर,_
सच्ची चाहत को अमरता दिलवाई।_
सुग्रीव की प्राण रक्षाकर,_
रक्षण क्षत्रिय धर्म बताया।_
बजरंगबली के हृदय में रहकर,_
भक्ति की महिमा बढ़ायी।_
लंकेश्वर रावण का नाश कर,_
धर्म की रक्षा करना शीखाया।_
राज के धोबी के प्रश्न पर,_
प्रजा वत्सल ने न्याय की झाँकि दिखाई।_
सदगुणी रामजी को पाकर,_
समग्र धरती पावन हो गयी।_
मर्यादा पुरषोत्तम राम ने अपने द्रष्टांत से,_
हमे शिष्टाचार ग्यान देकर,_
सत्य का मार्ग दिखाया।_

" जय श्री राम जी "
*

रविवार, 6 सितंबर 2009

जुदा नहीं है

जुदा नहीं है
- Kaushalya
जिस तरह समन्दर से उसकी लहर जुदा नहीं
नदी से उसका किनारा
जैसे शब्द से उसका अर्थ
फूलों से उसकी सौरभ
जैसे दिल से धड़कने
जिस तरह रस्ते से उसकी मंज़िल
प्रार्थना से दुआ जुदा नहीं
जैसे पायल से उसकी आवाज़
चूड़ियों से उसकी खनक
पहाड़ों से उसकी अचलता
बच्चो से उसकी चंचलता
जैसे मोसम से उसकी बहारें
चाँद से उसकी चांदनी की शीतल रोशनी
जिस तरह पंछियों से उनका कलरव
जिस तरह ह्रदय से उसकी कोमलता
आकाश से उसकी विशालता
जिस तरह शारीर से आत्मा
जिस तरह तारों से उसकी टीम-टीम
मन से विचार जुदा नहीं
संगीत से उसकी मधुरता
गीतों से उसकी सरगम
जिस तरह दिवानों से दिवानगी जुदा नहीं
जिस तरह परमेश्वर से उसकी करुणा
कुंदन से उसकी एहमियत जुदा नहीं
इस तरह....
आपसे हमारा प्रेम जुदा नहीं
क्योकि,..
हम बने है एक दूजे के लिए ।
*